जहां आज भी सांस लेता है इतिहास
जहां आज भी सांस लेता है इतिहास
छोटी समाध और बड़ी समाध केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कोटा की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी हैं। यह स्थान बताता है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो विकास और विरासत संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
कोटा। चंबल के किनारे दो ऐतिहासिक धरोहरें छोटी समाध और बड़ी समाध गौरवशाली विरासत की गवाह हैं। कभी यह स्थान संतों के मठ और साधना स्थल थे। समय बीतने के साथ इमारतों पर मौसम की मार पड़ती गई, दीवारें कमजोर होती गईं और बुर्जों का सौंदर्य भी फीका पड़ने लगा। नगर निगम समय-समय पर केवल रंगाई-पुताई और छोटी-मोटी मरम्मत तक ही सीमित रहा।
फिर चंबल रिवर फ्रंट के निर्माण के दौरान इन दोनों ऐतिहासिक समाधियों के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए नई मजबूती और नई पहचान दी। यही वजह है कि आज पर्यटक इन समाधियों को देखने पहुंचते हैं और पहली नजर में ही इनकी नक्काशी, स्थापत्य और चंबल किनारे का सौंदर्य आकर्षित कर लेता है।
कभी यह इलाका शहर की भीड़भाड़ से अलग एक शांत स्थान था। रामपुरा कोतवाली के सामने ग्रैंड होटल वाली गली से होते हुए लोग यहां पहुंचते थे। पुराने शहर के बुजुर्ग बताते हैं कि यहां साधु-संतों का आना-जाना रहता था। समाधियों के आसपास आध्यात्मिक वातावरण रहता था और चंबल के घाट तक जाने वाले श्रद्धालु यहां विश्राम भी करते थे।
रिवर फ्रंट बनने के दौरान इन दोनों समाधियों का विशेष संरक्षण किया गया। पत्थरों की मरम्मत की गई, कमजोर हिस्सों को मजबूत बनाया गया और जहां आवश्यकता थी वहां पारंपरिक शैली में पुनर्निर्माण किया। आधुनिक निर्माण के बावजूद मूल स्थापत्य को नुकसान नहीं पहुंचाया गया।
समाधियों की दीवारों और शिखरों पर बनी बारीक नक्काशी आज भी राजस्थानी शिल्पकला की उत्कृष्ट मिसाल है। जगह-जगह देवी-देवताओं की आकृतियां, पुष्प अलंकरण और पारंपरिक स्थापत्य शैली इन इमारतों को विशिष्ट बनाती है। बड़ी समाध के मंदिरनुमा शिखर और छोटी समाध की सुंदर छतरियां आकर्षण का केंद्र हैं।
रिवर फ्रंट के विकास के दौरान यहां दशावतार की मूर्तियां स्थापित की गईं। भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों को दर्शाती प्रतिमाएं और भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा विशेष ध्यान आकर्षित करती है।
दोनों समाधियों के आसपास बने बुर्जों को भी मजबूत किया गया। कमजोर हो चुकी दीवारों को संरक्षित करते हुए उनके मूल स्वरूप को बनाए रखा।
बुर्जों के ऊपर बनी छतरियों को लाल रंग की पारंपरिक सजावट दी है। शाम ढलते ही इन पर लगाई गई फ्लडलाइटें पूरी विरासत को सुनहरे रंग में नहला देती हैं। रात के समय यह दृश्य किसी ऐतिहासिक फिल्म के सेट जैसा दिखाई देता है।
इन बुर्जों के बीच बना मार्ग सीधे चंबल घाट तक पहुंचता है। वहीं ऊपर की ओर बना रास्ता रिवर फ्रंट के मुख्य मार्ग से जुड़ता है। यह व्यवस्था इस तरह तैयार की गई कि ऐतिहासिक धरोहर भी सुरक्षित रहे और पर्यटकों की आवाजाही भी बाधित न हो।
रिवर फ्रंट बनने के बाद यह स्थान शहर की नई पहचान बन गया है। हर दिन बड़ी संख्या में पर्यटक इन समाधियों को देखने पहुंचते हैं। सुबह धार्मिक वातावरण और शाम को रोशनी के बीच यह पूरा परिसर अलग ही आभा बिखेरता है।
इनका कहना है...
छोटी समाध और बड़ी समाध कभी संतों के प्रमुख मठ थे। रिवर फ्रंट के विकास के दौरान सबसे अच्छी बात यह रही कि इनका मूल स्वरूप नहीं बदला गया, बल्कि इन्हें मजबूत और आकर्षक बनाया गया। दशावतार की प्रतिमाएं, बुर्जों का संरक्षण और फ्लडलाइटिंग ने इनकी खूबसूरती कई गुना बढ़ा दी है। यदि टिकट दरें आम लोगों के अनुरूप हों तो यहां पर्यटकों की संख्या और बढ़ सकती है। यह कोटा की ऐसी धरोहर है, जिसे हर व्यक्ति को एक बार जरूर देखना चाहिए।
- एएच जैदी
छोटी समाध और बड़ी समाध केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि कोटा रियासत के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर है। इनका ऐतिहासिक महत्व रहा है। संरक्षण कार्य के दौरान इनकी मूल स्थापत्य शैली को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी उपलब्धि रही। हमारी विरासत आने वाली पीढ़ियों तक उसी स्वरूप में पहुंचे, यही सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसे ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
- बहादुर सिंह हाड़ा, को कन्वीनर, इंटेक
आपकी क्या प्रतिक्रिया है?