राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस पर विशेष
राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस पर विशेष
डब्ल्यूएचओ मानक से कई गुना ज्यादा बढ़े सिजेरियन डिलीवरी के मामले, हाड़ौती में बदल रहा प्रसव का स्वरूप
कोटा। सुरक्षित मातृत्व को लेकर सरकार और स्वास्थ्य विभाग लगातार दावे कर रहे हैं, लेकिन प्रदेश में प्रसव का स्वरूप तेजी से बदलता जा रहा है। सामान्य प्रसव की जगह अब सिजेरियन डिलीवरी (सी-सेक्शन) के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। स्थिति यह है कि राजस्थान में सिजेरियन डिलीवरी का प्रतिशत विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तय मानकों से कई गुना अधिक पहुंच चुका है।
राजस्थान स्वास्थ्य विभाग के वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में सिजेरियन डिलीवरी की दर 40 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। वहीं कोटा जैसे बड़े शहरों में यह आंकड़ा 42 से 45 प्रतिशत तक पहुंच गया है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी क्षेत्र में सिजेरियन डिलीवरी की आदर्श दर 10 से 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे अधिक दर स्वास्थ्य तंत्र में असंतुलन और अनावश्यक ऑपरेशन की ओर संकेत करती है।
हर दूसरी डिलीवरी ऑपरेशन के करीब
हाड़ौती संभाग में प्रसव के तरीके में तेजी से बदलाव दिखाई दे रहा है। शहरों में अब लगभग हर दूसरी डिलीवरी ऑपरेशन से होने लगी है। पहले जहां सामान्य प्रसव को प्राथमिकता दी जाती थी, वहीं अब प्रसूताओं और अस्पतालों दोनों का झुकाव सिजेरियन की ओर बढ़ता जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य प्रसव में 10 से 12 घंटे तक इंतजार करना पड़ता है और इस दौरान प्रसूता को तेज प्रसव पीड़ा से गुजरना पड़ता है। दूसरी ओर सिजेरियन डिलीवरी लगभग एक घंटे में पूरी हो जाती है। यही कारण है कि कई महिलाएं प्रसव पीड़ा से बचने के लिए स्वयं सी-सेक्शन की मांग करने लगी हैं।
सरकारी अस्पतालों में भी अब सिजेरियन डिलीवरी का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, हालांकि निजी अस्पतालों में इसकी दर और अधिक है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जरूरत पड़ने पर सिजेरियन जीवनरक्षक प्रक्रिया है, लेकिन बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के इसकी बढ़ती प्रवृत्ति चिंताजनक है।
हाड़ौती संभाग में तेजी से बढ़े मामले
राजस्थान स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार कोटा जिले में सरकारी अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी का प्रतिशत 42 से 45 तक पहुंच गया है। निजी अस्पतालों में यह आंकड़ा 55 से 65 प्रतिशत तक बताया जा रहा है।
वहीं बूंदी, बारां और झालावाड़ जिलों में सरकारी अस्पतालों में अब भी 80 से 90 प्रतिशत तक सामान्य प्रसव हो रहे हैं, लेकिन निजी अस्पतालों में 45 से 55 प्रतिशत डिलीवरी सिजेरियन से हो रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े शहरों में निजी स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, सुविधाओं की उपलब्धता और समय प्रबंधन के कारण सिजेरियन डिलीवरी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
बारां में अब भी सामान्य प्रसव को प्राथमिकता
बारां जिले में आदिवासी क्षेत्र अधिक होने और निजी अस्पतालों की संख्या कम होने के कारण अब भी सामान्य प्रसव को प्राथमिकता दी जाती है। किशनगंज और शाहबाद जैसे आदिवासी इलाकों में महिलाएं घरेलू या संस्थागत सामान्य प्रसव को ही अपनाती हैं।
हालांकि जटिल मामलों में मरीजों को कोटा रेफर किया जाता है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आज भी महिलाएं सामान्य प्रसव के प्रति अधिक सहज हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में सी-सेक्शन को आसान विकल्प माना जाने लगा है।
बूंदी में संसाधनों की कमी, कोटा पर बढ़ा दबाव
बूंदी जिले में बड़े निजी अस्पतालों और उन्नत चिकित्सा ढांचे की कमी के कारण अधिकतर हाई रिस्क प्रेग्नेंसी केस कोटा रेफर किए जाते हैं। जिला अस्पताल बूंदी से गंभीर मामलों को न्यू मेडिकल कॉलेज कोटा भेजा जाता है।
हाल ही में कोटा न्यू मेडिकल कॉलेज में सिजेरियन डिलीवरी के बाद छह महिलाओं की किडनी फेल होने का मामला सामने आया था, जिनमें बूंदी की एक महिला भी शामिल थी। इसके बाद हाई रिस्क मामलों में रेफरल और निगरानी को लेकर स्वास्थ्य विभाग अधिक सतर्क हो गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण जिलों में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित नहीं होने से कोटा जैसे बड़े चिकित्सा केंद्रों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।
बॉर्डर क्षेत्र झालावाड़ में सामान्य प्रसव ज्यादा
झालावाड़ जिला मध्यप्रदेश की सीमा से लगा हुआ है और यहां दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्र अधिक हैं। पहुंच की कठिनाइयों और सीमित निजी स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण यहां अब भी सामान्य प्रसव की संख्या अधिक बनी हुई है।
सरकारी अस्पतालों में यहां 85 से 88 प्रतिशत तक सामान्य प्रसव दर्ज किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की जीवनशैली और पारंपरिक सोच भी सामान्य प्रसव की अधिकता का कारण है।
आखिर क्यों बढ़ रहे सिजेरियन के मामले
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार सिजेरियन डिलीवरी बढ़ने के पीछे कई सामाजिक और चिकित्सकीय कारण जिम्मेदार हैं।
1. हाई रिस्क प्रेग्नेंसी में बढ़ोतरी
आजकल महिलाओं में शुगर, हाई ब्लड प्रेशर, थायरॉइड और मोटापे जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। देर से शादी और देर से गर्भधारण भी जटिलताओं को बढ़ा रहे हैं। ऐसे मामलों में डॉक्टर सिजेरियन को सुरक्षित विकल्प मानते हैं।
2. डॉक्टरों और स्टाफ की कमी
सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की कमी के कारण सामान्य प्रसव के लिए लंबे समय तक निगरानी करना मुश्किल हो जाता है। सामान्य डिलीवरी में 12 से 16 घंटे तक का समय लग सकता है, जबकि सिजेरियन अपेक्षाकृत जल्दी हो जाता है।
3. दर्द का डर और “ऑन डिमांड” सी-सेक्शन
अब कई महिलाएं प्रसव पीड़ा सहन नहीं करना चाहतीं। कुछ मामलों में परिवार विशेष तारीख या शुभ मुहूर्त में बच्चे का जन्म चाहते हैं। इसके चलते “ऑन डिमांड” सिजेरियन की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
4. निजी अस्पतालों का व्यावसायिक दबाव
विशेषज्ञ मानते हैं कि निजी अस्पतालों में समय और संसाधन प्रबंधन के कारण भी सिजेरियन को प्राथमिकता दी जाती है। सामान्य प्रसव की तुलना में सिजेरियन अधिक महंगा होता है और इसमें समय कम लगता है।
विशेषज्ञों की राय
प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. असमा खान के अनुसार सरकारी अस्पतालों में अब भी सामान्य प्रसव की संख्या निजी अस्पतालों से अधिक है। उनका कहना है कि पहले महिलाएं सामान्य प्रसव को प्राथमिकता देती थीं, लेकिन अब दर्द के डर के कारण वे स्वयं सिजेरियन की मांग करने लगी हैं।
उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर सी-सेक्शन मां और बच्चे दोनों की जान बचाने वाली प्रक्रिया है, लेकिन अनावश्यक सिजेरियन से बचना जरूरी है। लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए महिलाओं में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि वे सामान्य प्रसव के महत्व को समझ सकें।
मातृ स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ती सिजेरियन डिलीवरी भविष्य में महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती है। सी-सेक्शन के बाद रिकवरी में अधिक समय लगता है और अगली गर्भावस्था में भी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।
राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जरूरत के अनुसार ही सिजेरियन अपनाने और सामान्य प्रसव को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई है। उनका कहना है कि सुरक्षित मातृत्व केवल आधुनिक तकनीक से नहीं बल्कि संतुलित और वैज्ञानिक प्रसव व्यवस्था से संभव है।
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