ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ी वैश्विक चिंता, कच्चे तेल में उछाल का असर भारत पर भी संभव

मई 9, 2026 - 18:37
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ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ी वैश्विक चिंता, कच्चे तेल में उछाल का असर भारत पर भी संभव

ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ी वैश्विक चिंता, कच्चे तेल में उछाल का असर भारत पर भी संभव

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था की चिंताएं बढ़ा दी हैं। Iran और United States के बीच जारी तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका सीधा असर भारत समेत कई तेल आयातक देशों पर पड़ सकता है। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड की कीमतों में पिछले कुछ दिनों के दौरान उल्लेखनीय तेजी देखी गई है। निवेशकों को आशंका है कि यदि मध्य पूर्व में संघर्ष और बढ़ता है, तो तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता बढ़ी हुई है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल की सप्लाई होती है। किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि या आपूर्ति बाधा का असर वैश्विक तेल बाजार पर तुरंत पड़ सकता है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ना लगभग तय माना जाता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं, तो तेल विपणन कंपनियां पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा सकती हैं।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर परिवहन, उत्पादन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ सकती है और आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। खास तौर पर ट्रांसपोर्ट सेक्टर, कृषि और उद्योगों पर इसका प्रभाव अधिक दिखाई देता है।

सरकार फिलहाल स्थिति पर नजर बनाए हुए है। पेट्रोलियम मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के अधिकारी अंतरराष्ट्रीय बाजार की गतिविधियों का लगातार आकलन कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो सरकार टैक्स में कटौती या अन्य राहत उपायों पर विचार कर सकती है ताकि उपभोक्ताओं पर बोझ कम किया जा सके।

विश्लेषकों का यह भी मानना है कि वैश्विक निवेशक फिलहाल भू-राजनीतिक जोखिमों को लेकर सतर्क हो गए हैं। तेल की कीमतों में तेजी के साथ शेयर बाजारों में भी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। भारतीय बाजार में भी ऊर्जा, परिवहन और विमानन क्षेत्र की कंपनियों पर इसका असर पड़ सकता है।

उधर आम उपभोक्ताओं के बीच पेट्रोल और डीजल की संभावित कीमत वृद्धि को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। कई शहरों में लोगों का कहना है कि पहले से बढ़ती महंगाई के बीच यदि ईंधन की कीमतें और बढ़ती हैं, तो घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत लंबे समय से वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन फिलहाल देश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल आयात पर निर्भर है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर भारत पर तेजी से दिखाई देता है।

फिलहाल पूरी दुनिया की नजर मध्य पूर्व की स्थिति पर टिकी हुई है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होता है, तो तेल बाजार में स्थिरता लौट सकती है। लेकिन यदि हालात और बिगड़ते हैं, तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है, जिसका असर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।

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