नीट पेपर लीक ने खड़ा किया बड़ा सवाल: क्या प्रतिभा से ज्यादा पैसे तय करेंगे भविष्य?
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नीट पेपर लीक की बहस ने खड़ा किया बड़ा सवाल
# प्रतिभा की जीत या आर्थिक ताकत तय करेगी भविष्य
डॉक्टर-इंजीनियर बनने के सपने पर क्या सिर्फ अमीरों का अधिकार?
नीट पेपर लीक को लेकर दिल्ली समेत पूरे भारत में बवाल मचा हुआ है। पेपर लीक के पीड़ित दो दर्जन से अधिक स्टूडेंट सुसाइड कर चुके हैं लेकिन इसके बीच एक सवाल अभी भी अनुत्तरित है कि क्या कोचिंग के मकरजाल के बीच क्या देश में सभी को समान अवसर है। तमिलनाडु में तो नीट के आयोजन को लेकर ही बहस तेज हो गई है। राज्य सरकार का कहना है कि नीट परीक्षा ग्रामीण, सरकारी स्कूलों और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के साथ न्याय नहीं करती, जबकि केंद्र और समर्थकों का तर्क है कि देशभर में मेडिकल प्रवेश के लिए एक समान परीक्षा ही पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करती है।
वास्तव में कोटा, सीकर, जयपुर, दिल्ली जैसे शहरों में हजारों किशोर आंखों में डॉक्टर और इंजीनियर बनने का सपना लेकर कदम रखते हैं। उनके साथ आते हैं मां-बाप के सपने, गांव की उम्मीदें और कई परिवारों की जीवनभर की जमा-पूंजी। लेकिन इनको देखने के बाद यही लगता है कि क्या कोई साधनहीन लेकिन प्रतिभाशाली छात्र बिना लाखों रुपए खर्च किए डॉक्टर या आईआईटी इंजीनियर बन सकता है।
फीस समेत दस लाख का खर्च
कोटा में आने वाले अधिकतर मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवारों के बच्चे होते हैं। कोई किसान का बेटा है, कोई मजदूर की बेटी, तो कोई छोटे दुकानदार का इकलौता सहारा। इनमें से अनेक परिवार एक से तीन लाख रुपए तक की कोचिंग फीस जमा करते हैं। इसके बाद हॉस्टल, मेस, किताबें, टेस्ट सीरीज, परिवहन और अन्य खर्च मिलाकर एक वर्ष का खर्च चार से छह लाख रुपये तक पहुंच जाता है। दो साल की तैयारी का मतलब आठ से दस लाख रुपए तक का निवेश। कई परिवार इसके लिए जमीन गिरवी रखते हैं। कोई कर्ज लेता है तो कोई गहने तक बेच देती है। यह खर्च बेटे या बेटी के भविष्य पर लगाया गया विश्वास होता है। लेकिन हर परिवार ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं होता।
प्रतिभा गांव से भी जन्म लेती है
गांवों में ऐसे छात्र हैं जो स्कूल में हमेशा अव्वल आते हैं। प्रतिभा के साथ मेहनत और डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना भी पालते हैं। लेकिन संसाधनों की कमी की वजह से मन मसोस कर रह जाते हैं क्योंकि महंगी कोचिंग, हॉस्टल या पीजी में रहने खाने का खर्च और अध्ययन सामग्री का बोझ उनका परिवार उठाने में सक्षम नहीं है। यही कारण है कि कई छात्र प्रतियोगी परीक्षा देने से पहले ही अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं।
समान अवसर केवल किताबों तक सीमित
भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अवसर देने की बात करता है। लेकिन यदि मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंच का रास्ता महंगी कोचिंग से होकर गुजरने लगे, तो स्वाभाविक है कि समान अवसर का सिद्धांत व्यवहार में प्रभावी नहीं दिखता। हालांकि प्रतिभा आर्थिक स्थिति देखकर पैदा नहीं होती। बाबा साहेब आंबेडकर जैसे अनेकों उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन वर्तमान कोचिंग मॉडल उन परिवारों के पक्ष में अधिक दिखाई देता है जो लाखों रुपये खर्च कर सकते हैं। ऐसे में परीक्षा में बैठे गरीब और अमीर छात्र की तैयारी समान परिस्थितियों से नहीं होती।
कोचिंग ने बदली तैयारी, लेकिन बढ़ा दी दूरी
कोटा, सीकर, दिल्ली समेत कोचिंग के लिए चर्चित शहरों ने मेडिकल और आईआईटी में प्रवेश के हजारों छात्रों के सपने को साकार किया है। इसका कारण छात्रों की प्रतिभा और मेहनत के साथ कोचिंग संस्थानों की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का प्रमुख हाथ है। लेकिन दूसरा पक्ष भी है। केवल कक्षा में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। अलग टेस्ट सीरीज, माइक्रो बैच, पर्सनल मेंटर, रैंक इंप्रूवमेंट प्रोग्राम और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं। इनका लाभ वही विद्यार्थी उठा पाता है, जिसके परिवार की आर्थिक क्षमता इसकी अनुमति देती है।
वही प्रतियोगिता में केवल प्रतिभा और संसाधनों दोनों की जरूरत महसूस होती है। एक साधन विहीन और सम्पन्न शहरी विद्यार्थी के बीच बराबरी की कल्पना नहीं की जा सकती। प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान में पढ़ रहे छात्र को अनुभवी शिक्षक, सटीक अध्ययन सामग्री है और टेस्ट के द्वारा तैयारी का विश्लेषण करने का अवसर है। जबकि गांव के सरकारी विद्यालय के छात्र को बगैर कोचिंग, इंटरनेट की कमजोर सुविधा और पुरानी किताबों के सहारे तैयारी कहां टिक पाएगी। दोनों एक ही प्रश्नपत्र हल करेंगे। लेकिन वास्तव में उनके बीच समान अवसर नहीं होंगे। यही कोचिंग व्यवस्था की चुनौती है।
समाधान संभव है
आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए कम लागत या निशुल्क क्रैश कोर्स उपलब्ध कराके, अंतिम चरण की तैयारी, विषयों का पुनरावलोकन और गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन मदद दे सकता है। निजी कोचिंग संस्थानों को सामाजिक जिम्मेदारी के तहत छात्रवृत्ति, फीस में रियायत, निःशुल्क आवास और विशेष सहायता योजनाएं शुरू करनी चाहिए। शिक्षा ऋण की प्रक्रिया सरल हो, ताकि अभिभावकों को ऊंचे ब्याज पर निजी कर्ज लेने या जमीन गिरवी रखने की मजबूरी न हो। यदि प्रतिभाशाली छात्र आर्थिक कारणों से पिछड़ें तो यही कर पाए, तो नुकसान केवल उस विद्यार्थी का नहीं होगा। देश एक योग्य डॉक्टर, वैज्ञानिक या इंजीनियर खो देगा। यही असमानता आज सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है।
अब समय आ गया है कि चर्चा इस बात पर हो कि भारत की सबसे कठिन प्रवेश परीक्षाओं में सफलता का आधार केवल प्रतिभा और मेहनत होना चाहिए। यदि इस प्रश्न का उत्तर समाज, सरकार और शिक्षा व्यवस्था मिलकर नहीं खोज पाए, तो आने वाले समय में हजारों गरीब लेकिन प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के सपने फीस की रसीदों के नीचे दबते रहेंगे।
तमिलनाडु की आपत्ति
तमिलनाडु का तर्क देना रहा है कि नीट ने मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया को कोचिंग आधारित मेरिट में बदल दिया है। परीक्षा का स्वरूप उन छात्रों को अधिक लाभ देता है, जिन्हें महंगी और व्यवस्थित कोचिंग उपलब्ध होती है। इसके विपरीत सरकारी स्कूलों, ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन है।
इसी आधार पर तमिलनाडु ने सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए मेडिकल सीटों में 7.5 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण लागू किया। जस्टिस एके राजन समिति का गठन कर यह अध्ययन भी कराया कि नीट लागू होने के बाद किन वर्गों के छात्रों का मेडिकल कॉलेजों में प्रतिनिधित्व प्रभावित हुआ।
नीट 2016 से पूरे देश में हुई अनिवार्य
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी द्वारा आयोजित नीट को 2013 में मेडिकल में एडमिशन के लिए शुरू किया गया था और 2016 में पूरे भारत में इसे अनिवार्य कर दिया गया। पिछले तीन सालों में नीट के पेपर दो बार लीक हुए। 2024 में बिहार में एक जगह पर लीक हुआ, और 2026 में राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा में बड़े पैमाने पर लीक हुआ। लगभग 22.8 लाख छात्र इस परीक्षा में शामिल हुए। इसके बाद दोबारा परीक्षा हुई, जिसमें सरकार ने प्रश्न पत्र पहुंचाने के लिए ड्रोन व एयरफोर्स के विमानों का इस्तेमाल किया। उन्हें क्यूआर कोड वाले सुरक्षित कमरों में रखा, और आईबी व सीबीआई को भी शामिल किया। परेशान छात्रों के आत्महत्या करने का सिलसिला जारी रहा, जिससे परिवार हिल गए और सिस्टम की विफलता सामने आई।
भारत के राजनीति, उद्योग, मीडिया, खेल या फिल्म जगत के प्रभावशाली परिवार अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजते हैं। अपने शहर के प्रभावशाली लोगों की सूची देखेंगे तो एक भी ऐसा नहीं मिलेगा जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों, कॉलेजों में हों। यही सबसे बड़ा शैक्षिक विरोधाभास है। एक वर्ग के बच्चे देश भर के कोचिंग सेंटर में वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। जबकि सम्पन्न और प्रभावशाली लोगों के बच्चे हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड, येल, स्टैनफोर्ड, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में जाते हैं। हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था नहीं बना पाए जिस पर देश के सबसे प्रभावशाली लोग भी भरोसा करें।
गरीब बच्चों का सपना नहीं रहे अधूरा
नीट पेपर लीक पर देशभर में आंदोलन हो रहे हैं। इससे वृहत भागीदारी सामने आ रही है। छात्र सड़कों और अदालतों की शरण में हैं। सरकार अब सामने आ रही है कि केवल परीक्षा की निष्पक्षता के साथ-साथ यह भी तय करना होगा कि क्या हम एक ऐसा देश बन सकते हैं जहां प्रवेश परीक्षा में भी समानता का अवसर केवल प्रतिभा और मेहनत होना चाहिए ना कि पैसे की ताकत। इस प्रश्न का उत्तर समाज, सरकार और शिक्षा व्यवस्था को मिलकर खोजना होगा। यदि ऐसा नहीं किया तो गरीब लेकिन प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का सपना अधूरा ही रह जाएगा।
छात्रों के हित में कदम उठाते
कोचिंग मॉडल सिर्फ और सिर्फ व्यापारिक लाभ से प्रेरित होकर निजी हाथ में है। यदि विशेषाधिकार भी आधार होता तो छात्रों के हित में कदम उठाते तो विद्यार्थियों के हित में उनकी प्रतिभा को निखारते और उनको संसाधनों से प्रेरित करते। परंतु हो तो उल्टा रहा है जो छात्रों की राजनीतिक और प्रशासनिक पकड़ उनके ऊपर सफेद दाग बन रहा है। मैं दावे के साथ कहता हूं कि जो निर्णयकर्ताओं के चहेते हैं, वही ले रहे होंगे और अपने लक्ष्य पर आसीन हैं।