सिस्टम की बेरुखी से जूझता मदर मिल्क बैंक, अब शाम 5 बजे तक खुलेगा केंद्र
सिस्टम की बेरुखी से जूझता मदर मिल्क बैंक, अब शाम 5 बजे तक खुलेगा केंद्र
कोटा। जेके लोन चिकित्सालय परिसर स्थित मदर मिल्क बैंक के संचालन समय में आखिरकार बदलाव कर दिया गया है। अब यह बैंक सुबह 8:30 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहेगा। इससे पहले यहां दोपहर 2 बजे ही ताले लग जाते थे, जिसके कारण गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में भर्ती नवजातों के परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था।
इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए 9 मई को प्रकाशित समाचार ‘वेंटिलेटर पर अमृत, सिस्टम की बेरुखी से मासूमों के हक पर ताला’ के बाद अस्पताल प्रशासन हरकत में आया। खबर प्रकाशित होने के बाद जेके लोन चिकित्सालय अधीक्षक ने मदर मिल्क बैंक के समय और व्यवस्थाओं में परिवर्तन किया। हालांकि इस पूरे मामले ने अस्पताल प्रशासन और एनएचएम की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
दोपहर 2 बजे बंद हो जाता था बैंक
मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जेके लोन चिकित्सालय में लगातार प्रसूताओं की हालत बिगड़ने और मौत के मामलों के बीच कई नवजात एनआईसीयू में भर्ती हैं। ऐसे बच्चों के लिए मां का दूध जीवनरक्षक औषधि की तरह माना जाता है। लेकिन परिजन जब मदर मिल्क बैंक पहुंचते थे तो उन्हें अक्सर बंद दरवाजे ही मिलते थे।
परिजनों का आरोप था कि बैंक दोपहर 2 बजे ही बंद कर दिया जाता था, जबकि नवजातों को दिनभर दूध की आवश्यकता रहती है। कई बार दूरदराज से आने वाले परिवारों को बिना दूध लिए ही लौटना पड़ता था। इससे मजबूरी में डॉक्टरों द्वारा लिखे गए पाउडर दूध का सहारा लेना पड़ रहा था, जो कई नवजातों को सूट भी नहीं कर रहा।
अधीक्षक के जवाब पर उठे सवाल
इस मामले में जब जेके लोन चिकित्सालय अधीक्षक डॉ. निर्मला शर्मा से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा था कि अस्पताल एनएचएम की गाइडलाइन के अनुसार मदर मिल्क बैंक का संचालन कर रहा है।
लेकिन अब अचानक समय बढ़ाकर शाम 5 बजे तक कर देना इस दावे पर सवाल खड़े कर रहा है। यदि पहले से गाइडलाइन यही थी तो फिर दोपहर 2 बजे तक ही संचालन क्यों हो रहा था? क्या समाचार प्रकाशित होने के बाद एनएचएम की गाइडलाइन बदल गई या फिर अब तक नवजातों को उनकी जरूरत का दूध देने में लापरवाही बरती जा रही थी?
स्टाफ की कमी और अव्यवस्था
जननायक प्रतिनिधि जब दोपहर पौने दो बजे मदर मिल्क बैंक पहुंचा तो वहां स्टाफ में बदलाव तो दिखाई दिया, लेकिन व्यवस्थाएं अब भी अधूरी नजर आईं। जानकारी के अनुसार यहां एक इंचार्ज और तीन नर्सिंग कर्मचारी तैनात हैं। इनमें से भी एक कर्मचारी को एमएनआईसीयू में लगाया गया था, जिसे बाद में वापस बुलाया गया।
मौके पर मौजूद लोगों का कहना था कि प्रशिक्षित स्टाफ की कमी के कारण महिलाओं को काफी देर तक इंतजार करना पड़ता है। कई बार बैंक की इंचार्ज मीटिंग में रहती हैं और स्टाफ मरीजों को स्पष्ट जानकारी नहीं दे पाता। कुछ कर्मचारियों ने तो यह तक कह दिया कि “अधीक्षक ने ऐसा ही आदेश किया हुआ है।”
उद्देश्य से भटकता मदर मिल्क बैंक
मदर मिल्क बैंक की स्थापना का मूल उद्देश्य उन नवजातों को मां का दूध उपलब्ध कराना था जिनकी मां किसी कारणवश दूध नहीं पिला पा रही हों या जिनकी प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई हो। लेकिन वर्तमान स्थिति में यह व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
यहां दूध डोनेट करने वाली माताओं की संख्या लगभग शून्य बताई जा रही है। बैंक में केवल उन्हीं महिलाओं का दूध उपयोग में लिया जाता है जिनके बच्चे एनआईसीयू में भर्ती हैं। यदि किसी महिला का दूध नवजात के लिए उपयुक्त नहीं होता तो उसे भी यहां से पर्याप्त सहायता नहीं मिल पाती।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जागरूकता अभियान चलाया जाए तो अतिरिक्त दूध वाली माताएं इसे दान कर सकती हैं और जरूरतमंद बच्चों को आसानी से उपलब्ध कराया जा सकता है।
“मां का दूध अमृत और दवा के समान”
कोटा मेडिकल कॉलेज की अतिरिक्त प्राचार्य ममता तिवारी का कहना है कि मदर मिल्क बैंक नवजातों के लिए अमृत और दवा के समान है। मां का दूध बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और संक्रमण से लड़ने में मदद करता है।
उन्होंने बताया कि पहले भी कोटा का मदर मिल्क बैंक काफी सफल रहा था। यहां से जरूरतमंद बच्चों के लिए अजमेर तक दूध भेजा गया था। एक महिला द्वारा 300 बार दूध दान करने का रिकॉर्ड भी बना था।
तिवारी ने कहा कि कोटा जैसे बड़े अस्पताल में दूध संग्रहण की अपार संभावनाएं हैं। यदि माताओं में जागरूकता बढ़ाई जाए तो यह व्यवस्था हजारों नवजातों के लिए वरदान साबित हो सकती है।
परिजनों की पीड़ा
इटावा निवासी चेतन मीणा ने कहा,
“मदर मिल्क बैंक होने के बावजूद बच्चों को पाउडर का दूध पिलाने की सलाह दी जा रही है। फिर ऐसे बैंक का क्या मतलब रह जाता है?”
वहीं कोटा निवासी राजेश ने बताया,
“मेरी भाभी ने बच्चे को जन्म दिया है। बच्चा एनआईसीयू में भर्ती है। डॉक्टरों ने पाउडर दूध लिखा, जिसे पिलाने पर बच्चे को उल्टियां होने लगीं। अगर मदर मिल्क बैंक सही तरीके से चलता तो यह परेशानी नहीं होती।”
अब बढ़ी उम्मीद
मदर मिल्क बैंक का समय बढ़ाकर शाम 5 बजे तक किए जाने के बाद परिजनों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। अब देर से आने वाली प्रसूताएं और उनके परिवार भी अपने नवजातों के लिए दूध प्राप्त कर सकेंगे।
हालांकि केवल समय बढ़ा देना ही पर्याप्त नहीं माना जा रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लिए प्रशिक्षित स्टाफ, बेहतर प्रबंधन, नियमित मॉनिटरिंग और माताओं में जागरूकता अभियान चलाने की भी आवश्यकता है।
यदि प्रशासन गंभीरता से काम करे तो मदर मिल्क बैंक उन मासूमों के लिए जीवनदायिनी व्यवस्था बन सकता है, जो जन्म के बाद जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। फिलहाल यह देखना बाकी है कि समाचार के बाद शुरू हुई यह सक्रियता स्थायी सुधार में बदलती है या कुछ दिनों बाद फिर व्यवस्थाएं पुराने ढर्रे पर लौट जाती हैं।
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