सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्यपाल विधानसभा से पारित बिलों को लंबित नहीं रख सकते

नवंबर 20, 2025 - 16:08
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्यपाल विधानसभा से पारित बिलों को लंबित नहीं रख सकते

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्यपाल विधानसभा से पारित बिलों को लंबित नहीं रख सकते

मंजूरी दें, वापस भेजें या राष्ट्रपति को भेजें; कोर्ट बोले—समयसीमा नहीं तय कर सकते, लेकिन अनुचित देरी पर हस्तक्षेप जरूर करेंगे**

नई दिल्ली। देश के संघीय ढांचे में राज्यपाल और राष्ट्रपति की भूमिका को लेकर लंबे समय से चल रहे विवादों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि गवर्नर और राष्ट्रपति दोनों के पास विधानसभा से पारित किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक रोके रखने का अधिकार नहीं है। उन्हें संविधान में दिए गए तीन विकल्पों में से किसी एक का उपयोग करना होगा—मंजूरी देना, पुनर्विचार के लिए विधानसभा को लौटाना, या राष्ट्रपति को भेजना।

यह फैसला विशेष रूप से उस राजनीतिक विवाद की पृष्ठभूमि में आया है जहाँ कई राज्यों—विशेषकर विपक्ष शासित राज्यों—ने आरोप लगाया था कि उनके राज्यपाल संवैधानिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी कर रहे हैं।


तमिलनाडु से शुरू हुआ विवाद और सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। तमिलनाडु के राज्यपाल ने राज्य विधानसभा द्वारा पारित कई विधेयकों को महीनों तक लंबित रखा और किसी प्रकार का निर्णय नहीं दिया। राज्य सरकार ने इसे ‘‘संवैधानिक दायित्वों से बचना’’ बताया और कहा कि इससे शासन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।

इसी विवाद पर निर्णय देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने पहले 8 अप्रैल को टिप्पणी की थी कि "राज्यपाल के पास किसी विधेयक पर वीटो पावर नहीं है" और उन्हें संविधान के प्रावधानों के अनुरूप कार्य करना होगा।

इसके बाद 11 अप्रैल को आए आदेश में कहा गया कि राष्ट्रपति को, राज्यपाल द्वारा भेजे गए बिलों पर तीन महीने के भीतर फैसला करना चाहिए। चूंकि यह संवैधानिक प्रश्न था, राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी। राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए 14 सवालों पर पिछले आठ महीनों से सुनवाई चल रही थी। गुरुवार को इस मामले पर ऐतिहासिक फैसला आया।


संविधान पीठ का सर्वसम्मत निर्णय—राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए कोई ‘डेडलाइन’ नहीं

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अगुआई वाली 5-सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा:

1. गवर्नर और राष्ट्रपति को समय-सीमा में बांधा नहीं जा सकता

कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक संरचना में न्यायपालिका, कार्यपालिका के संवैधानिक अधिकारों पर सख्त समयसीमा नहीं थोप सकती। यह विधायिका और संविधान-निर्माताओं का अधिकार क्षेत्र है।

कोर्ट ने कहा—
“गवर्नर और राष्ट्रपति की भूमिका नियत समयसीमा से बाध्य नहीं हो सकती। वे संवैधानिक प्रावधानों के तहत विवेक से फैसला करते हैं। न्यायपालिका इस पर डेडलाइन तय नहीं कर सकती।”

2. लेकिन अनिश्चित या अनुचित देरी संवैधानिक नहीं

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय राज्यपालों को खुली छूट नहीं देता।
अगर वे—

  • बिना कारण

  • लंबे समय तक

  • किसी राजनीतिक फायदा या उद्देश्य से

बिल रोककर रखते हैं, तो कोर्ट दखल दे सकता है और ‘‘सीमित निर्देश’’ जारी कर सकता है।

कोर्ट ने कहा—
“संवैधानिक पदाधिकारी भी संवैधानिक जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकते। देरी यदि अकारण हो, तो न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।”


राज्यपाल के तीन संवैधानिक विकल्प — जो अनिवार्य हैं

कोर्ट के अनुसार, अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल के पास सिर्फ तीन विकल्प हैं:

(1) मंजूरी देना (Assent)

यदि बिल संविधान के दायरे में है, तो राज्यपाल को उसे मंजूरी देनी चाहिए।

(2) पुनर्विचार के लिए विधानसभा को लौटाना (Return the Bill)

यदि राज्यपाल को किसी प्रावधान पर आपत्ति या कानूनी संदेह हो, तो वे बिल को विधानसभा को दोबारा विचार हेतु लौटा सकते हैं।
विधानसभा अगर उसे फिर पास कर दे, तो राज्यपाल बाध्य होंगे मंजूरी देने के लिए।

(3) राष्ट्रपति को भेजना (Reserve for consideration of the President)

जब किसी बिल में संविधान या राष्ट्रीय नीति से टकराव हो, या केंद्र-राज्य संबंधों पर प्रभाव हो, तब राज्यपाल उसे राष्ट्रपति को भेज सकते हैं।

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‘डीम्ड असेंट’ की अवधारणा लागू नहीं होगी

‘डीम्ड असेंट’ का मतलब होता है कि अगर राज्यपाल या राष्ट्रपति जवाब न दें तो माना जाएगा कि उन्होंने विधेयक को मंजूरी दे दी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस अवधारणा को खारिज करते हुए कहा:
“अनुमानित मंजूरी (Deemed Assent) का सिद्धांत भारतीय संविधान के अनुरूप नहीं है। ऐसे अनुमान का कोई कानूनी आधार नहीं।”

इससे यह स्पष्ट हो गया कि चुप्पी को मंजूरी मानने का रास्ता बंद है।


राज्यपाल सिर्फ ‘रबर स्टैंप’ नहीं—कोर्ट

पिछले कुछ सालों में विपक्षी दलों ने अक्सर आरोप लगाया है कि कुछ राज्यपाल राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण बिल रोकते हैं। वहीं, कुछ लोग यह भी कहते हैं कि राज्यपाल को मंत्रिमंडल की सलाह का ही पालन करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाया और कहा:

  • राज्यपाल पूरी तरह ‘‘रबर स्टैंप’’ नहीं हैं।

  • वे बिल की प्रकृति को समझकर विवेक का उपयोग कर सकते हैं।

  • लेकिन यह विवेक ‘‘संवैधानिक उद्देश्य’’ से विचलित नहीं होना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि बिल के गुण-दोष में न्यायपालिका दखल नहीं देगा।
लेकिन ‘‘प्रक्रिया’’ में देरी हो तो यह न्यायिक समीक्षा का मुद्दा बनेगा।


केंद्र सरकार बनाम विपक्षी राज्य—फैसले का व्यापक प्रभाव

इस मामले में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के शीर्ष विधि अधिकारियों—अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता—ने कहा कि राज्यपाल संवैधानिक विवेक के तहत ही काम कर रहे हैं।

वहीं, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, पंजाब, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश जैसे विपक्ष शासित राज्यों ने तर्क दिया कि राज्यपाल राजनीतिक कारणों से बिलों पर निर्णय टालते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दोनों पक्षों के बीच संतुलन स्थापित करता है।


संविधान पीठ में कौन-कौन थे?

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 5-सदस्यीय पीठ में शामिल थे:

  • जस्टिस सूर्यकांत

  • जस्टिस विक्रम नाथ

  • जस्टिस पीएस नरसिम्हा

  • जस्टिस एएस चंद्रचूड़कर

याद रहे कि इस मामले में CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने स्वयं को अलग कर लिया था।


विशेषज्ञों की राय—फेडरल स्ट्रक्चर को मिली मजबूती

शासन और संवैधानिक कानून विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारतीय संघीय ढांचे के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें निम्न बातें स्पष्ट हुईं—

  • राज्यपाल अपनी सीमाओं के भीतर कार्य करेंगे

  • सरकारें बिलों को रोककर राजनीतिक दबाव में नहीं रखेंगी

  • राज्य सरकारों का विधायी अधिकार सुरक्षित रहेगा

  • राष्ट्रपति की भूमिका भी स्पष्ट और जवाबदेह होगी

कुछ विशेषज्ञों ने इसे ‘‘संविधान की मूल भावना’’ की पुनर्स्थापना भी कहा।


अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्यों और राज्यपालों के बीच चल रहे कई विवाद स्वतः स्पष्ट हो जाएंगे।
केंद्र और राज्य दोनों को स्पष्ट मार्गदर्शन मिल गया है कि—

  • राज्यपालों को बिल रोककर नहीं रखना चाहिए

  • राष्ट्रपति को भी कार्रवाई में देरी नहीं करनी चाहिए

  • लेकिन उन पर कठोर समयसीमा भी नहीं थोप सकते

यह फैसला आने वाले वर्षों में कई संवैधानिक विवादों का आधार बनेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साबित किया कि वह भारतीय लोकतंत्र की ‘‘संवैधानिक संरचना’’ का अंतिम संरक्षक है।
राज्यपालों को अनिश्चितकाल तक विधेयक लंबित रखने की छूट न देकर, लेकिन उन्हें विवेक का अधिकार देकर, कोर्ट ने संतुलन की उस रेखा को मजबूत किया है जिसमें—

  • केंद्र

  • राज्य

  • और संवैधानिक पदाधिकारियों

सभी की अपनी-अपनी परिभाषित और नियंत्रित शक्तियाँ हैं।

यह फैसला भारतीय लोकतंत्र और संघीय ढांचे के लिए संतुलित, दूरदर्शी और ऐतिहासिक माना जाएगा।

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