रेयर अर्थ मेटल्स पर चीन की ढील से भारत को राहत, नवाचार सूचकांक में भारत की मजबूती के बीच व्यापार घाटा बना चुनौती
रेयर अर्थ मेटल्स पर चीन की ढील से भारत को राहत, नवाचार सूचकांक में भारत की मजबूती के बीच व्यापार घाटा बना चुनौती
नई दिल्ली/बीजिंग। चीन ने नागरिक उपयोग के लिए रेयर अर्थ मेटल्स (Rare Earth Metals) के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों में आंशिक ढील देने का फैसला किया है, जिससे भारत सहित कई देशों के उद्योगों को बड़ी राहत मिली है। यह निर्णय ऐसे समय पर आया है, जब वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन को लेकर चिंताएं बनी हुई थीं और भारत लगातार चीन के साथ इस मुद्दे को राजनयिक स्तर पर उठा रहा था।
जानकारी के अनुसार, चीन ने स्पष्ट किया है कि नागरिक उपयोग के लिए रेयर अर्थ मेटल्स के निर्यात को लेकर उन आवेदनों को मंजूरी दी जाएगी, जो तय नियामक मानकों को पूरा करते हैं। हालांकि, रक्षा और सैन्य उपयोग से जुड़े मामलों में इन मेटल्स के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध पहले की तरह लागू रहेंगे। माना जा रहा है कि भारत के निरंतर कूटनीतिक प्रयासों और वैश्विक उद्योगों की जरूरतों को देखते हुए चीन ने यह नरमी दिखाई है।
रेयर अर्थ मेटल्स इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए बेहद अहम हैं। भारत के लिए यह फैसला खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है।
इसी बीच, वैश्विक नवाचार सूचकांक (Global Innovation Index) 2025 में भारत ने अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। भारत की रैंकिंग 38वें स्थान पर रही, जो पिछले कुछ वर्षों में लगातार सुधार का संकेत है। भारत निम्न-मध्यम आय वर्गीय देशों में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है और केंद्रीय एवं दक्षिणी एशिया क्षेत्र में भी पहले स्थान पर है।
भारत का सबसे मजबूत प्रदर्शन ज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आउटपुट के क्षेत्र में रहा है, जहां उसकी रैंक 22वीं है। इसका मतलब है कि रिसर्च, स्टार्टअप्स, पेटेंट और तकनीकी उत्पादन के मामले में भारत की क्षमता लगातार बढ़ रही है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि व्यापार जटिलता, संस्थागत समर्थन और नीति-कार्यान्वयन जैसे क्षेत्रों में भारत को अभी और सुधार करने की जरूरत है।
वैश्विक स्तर पर नवाचार की दौड़ में चीन ने उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज की है। चीन ने ज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आउटपुट में स्विट्ज़रलैंड को पीछे छोड़ दिया है और पेटेंट फाइलिंग के मामले में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बन गया है। इसके अलावा, चीन R&D (अनुसंधान एवं विकास) खर्च के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर है, जो उसकी तकनीकी ताकत को दर्शाता है।
हालांकि, वैश्विक नवाचार परिदृश्य को लेकर एक चिंता की बात भी सामने आई है। वर्ष 2025 में वैश्विक R&D की वृद्धि दर घटकर अनुमानित 2.3 प्रतिशत रह गई है, जो 2010 की वैश्विक वित्तीय मंदी के बाद सबसे निचला स्तर है। विशेषज्ञों का मानना है कि भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और संरक्षणवादी नीतियां इसके पीछे बड़ी वजह हैं।
भारत-चीन आर्थिक संबंधों की बात करें तो एक अहम चुनौती अभी भी बनी हुई है। अनुमान है कि 2025 में भारत-चीन व्यापार घाटा बढ़कर 106 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इस बढ़ते घाटे के पीछे आयात-निर्यात के बीच असंतुलन, चीन पर निर्भरता और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग की सीमाएं प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि रेयर अर्थ मेटल्स पर चीन की ढील भारत के लिए एक अवसर है, लेकिन लंबे समय में भारत को आत्मनिर्भर सप्लाई चेन, घरेलू खनन और वैकल्पिक तकनीकों पर जोर देना होगा, ताकि व्यापार घाटे और रणनीतिक निर्भरता को कम किया जा सके।
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