मथुराधीशजी जैसी वैश्विक धार्मिक धरोहर के बावजूद कोटा की टूरिज़्म ब्रांडिंग अब भी दिशाहीन
मथुराधीशजी जैसी वैश्विक धार्मिक धरोहर के बावजूद कोटा की टूरिज़्म ब्रांडिंग अब भी दिशाहीन
कोटा।
जब-जब आस्था किसी शहर की अर्थव्यवस्था से जुड़ती है, तब विकास को स्वतः पंख लग जाते हैं। देश में उज्जैन, काशी और अयोध्या इसके ताज़ा उदाहरण हैं। इसके बावजूद अपार धार्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत से समृद्ध कोटा आज भी एक ठोस टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में अपनी पहचान स्थापित नहीं कर पाया है।
औद्योगिक नगरी से कोचिंग हब बनने और अब कोचिंग इंडस्ट्री में आई गिरावट के बाद कोटा को हाल ही में ‘टूरिस्ट सिटी’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई। इसी क्रम में तीन दिवसीय कोटा हाड़ौती ट्रेवल मार्ट का आयोजन किया गया। आयोजन में मंचीय चमक-दमक और प्रचार-प्रसार की कोई कमी नहीं दिखी, लेकिन सबसे बुनियादी सवाल—कोटा में ऐसा क्या है जिसके लिए देश-विदेश से पर्यटक आएं—पूरे आयोजन में लगभग अनुत्तरित ही रहा।
धार्मिक पर्यटन का स्वर्णिम अवसर, फिर भी उपेक्षा
कोटा के पास वह धार्मिक धुरी मौजूद है, जो किसी भी शहर को पर्यटन के मानचित्र पर स्थापित कर सकती है। दुनिया में पुष्टिमार्गीय संप्रदाय की प्रथम पीठ भगवान श्री मथुराधीशजी का मंदिर कोटा के पाटनपोल क्षेत्र में स्थित है। वल्लभाचार्य की परंपरा से जुड़ा यह स्थल न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी कारण इस क्षेत्र को नंदग्राम भी कहा जाता है।
इसके अतिरिक्त चंबल तट पर स्थित केशवरायजी मंदिर, जैन धर्म के प्रमुख तीर्थ, तथा आसपास के क्षेत्र में नाथद्वारा, खाटू श्यामजी, सालासर, बाबा रामदेव और सांवरिया सेठ जैसे सफल धार्मिक पर्यटन मॉडल मौजूद हैं। बावजूद इसके, कोटा ने कभी गंभीर प्रयास नहीं किए कि मथुराधीशजी को केंद्र में रखकर धार्मिक पर्यटन को व्यापक रूप से विकसित किया जाए।
इतिहास में दर्ज है कोटा की धार्मिक प्रतिष्ठा
इतिहास गवाह है कि वर्ष 1801 ईस्वी में जब महाराव शत्रुसालजी भगवान श्री मथुराधीशजी को बूंदी से कोटा लेकर आए थे, तब कोटा में ऐसा अभूतपूर्व उत्सव हुआ जिसकी गूंज पूरे भारतवर्ष में सुनाई दी। भगवान के दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ ने कोटा को उस समय धार्मिक मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाया था। महाराव उम्मेद सिंह के काल में आयोजित छप्पन भोग महोत्सव ने इस परंपरा को और सुदृढ़ किया।
लेकिन 1947 में रियासतों के विलय के बाद राजनीतिक प्राथमिकताओं और प्रचार-प्रसार के अभाव में यह गौरवशाली विरासत धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई।
पर्यटन स्थलों की भरमार, समग्र प्रस्तुति का अभाव
कोटा और हाड़ौती अंचल में पर्यटकों के लिए दुर्लभ स्थलों की कोई कमी नहीं है।
मुकुंदरा टाइगर रिज़र्व, चंबल घड़ियाल सेंचुरी, बूंदी का रामगढ़ विषधारी रिज़र्व, झालरापाटन का सूर्य मंदिर, गागरोन किला और भंडदेवरा जैसे स्थल यदि एक समग्र टूरिज़्म सर्किट के रूप में प्रस्तुत किए जाएं, तो कोटा देश का एक प्रमुख पर्यटन केंद्र बन सकता है।
दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेस-वे, रिंग रोड, नए रेल प्रोजेक्ट और प्रस्तावित ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट जैसी आधारभूत सुविधाएं इस संभावना को और मजबूत बनाती हैं। बावजूद इसके, स्पष्ट विज़न और ब्रांडिंग रणनीति का अभाव साफ़ दिखाई देता है।
मथुराधीशजी कॉरिडोर पर विमर्श, सहमति अब भी जरूरी
मथुराधीशजी मंदिर क्षेत्र में प्रस्तावित कॉरिडोर को लेकर शहर में व्यापक चर्चा चल रही है। अभी तक इसकी आधिकारिक ड्राइंग सामने नहीं आई है, लेकिन दर्शन व्यवस्था में सुधार, भीड़ नियंत्रण, पार्किंग और पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, व्यापारियों और निवासियों का कहना है कि परियोजना से पहले मास्टर प्लान, जनसहमति, उचित पुनर्वास और मुआवज़ा सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। वर्षों से किराए पर रह रहे परिवारों और दुकानदारों का पुनर्वास किए बिना किसी भी योजना को लागू करना सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकता है।
विजन के अभाव में अवसर हाथ से फिसलता कोटा
नाथद्वारा में श्रीनाथजी के आशीर्वाद से उदयपुर जिस तरह एक अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र के रूप में उभरा, उसी तरह कोटा भी मथुराधीशजी को केंद्र में रखकर अपनी आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान स्थापित कर सकता है।
आज देश के अन्य धार्मिक नगरों में जब कोटा का नाम लिया जाता है, तो साधु-संत श्रद्धा से कहते हैं—आपके यहाँ तो मथुराधीशजी की प्रथम पीठ है। यह कथन कोटा की उस पहचान की याद दिलाता है, जिसे शहर अब तक पूरी तरह समझ और संजो नहीं पाया।
जब तक पर्यटन को केवल आयोजनों और प्रचार तक सीमित रखा जाएगा और मूल आकर्षण को स्पष्ट रूप से सामने नहीं लाया जाएगा, तब तक कोटा की टूरिज़्म ब्रांडिंग दिशाहीन ही बनी रहेगी।
मथुराधीशजी जैसे वैश्विक धार्मिक केंद्र और अपार विरासत के बावजूद कोटा की 'टूरिज्म ब्राडिंग' अब भी दिशाहीन
जब-जब आस्था से अर्थव्यवस्था चलती है तब उस शहर के विकास के पंख लग जाते हैं कोटा। औद्योगिक से कोचिंग और मेडिकल सुविधा के दावे की विफलता के बाद कोटा में हाल ही में टूरिस्ट डेस्टीनेशन का नया शगूफा पेश किया। कुछ महीनों से मीडिया में भरपूर प्रचार से माहौल बनाकर तीन दिवसीय कोटा हाडोती ट्रेवल मार्ट के आयोजन में चकाचौंध रही, लेकिन कोटा को टूरिस्ट सिटी साबित करने के नाम पर क्या हुआ और किस तरह टूरिस्ट यहां आने के लिए आकर्षित होंगे, यह सवाल गौण रह गया। पूरे आयोजन में कहीं यह दिखाई नहीं दिया कि आखिर कोटा में ऐसा क्या है जिसके लिए टूरिस्ट यहां आए और डूबती कोचिंग इंडस्ट्री के झटके से कोटा की इकोनोमी को उबार सकें। जयपुर, उदयपुर अथवा जोधपुर टूरिस्ट क्यों आता है अथव इनसे भी ज्यादा टूरिस्ट खाटू श्याम जी और सालासर जी तथा नाथद्वारा और सांवरिया सेठ जी अथवा बाबा रामदेव के द्वार पर क्यों पहुंचते हैं, इस विषय को भी ध्यान में नहीं रखा गया। जैसलमेर में तो केवल रेत के धोरे हैं इसके बावजूद वहां टूरिस्ट की मारा मारी क्यों है अथवा रणथंभोर में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसी हस्तियां भी डेरा डालती हैं, इसके क्या कारण हैं। कोटा में नाथद्वारा, खाटू श्याम जी, सालासर जी, बाबा रामदेव और सांवरिया सेठ की तरह धार्मिक पर्यटन के स्वर्णिम अवसर हैं। इसका कारण दुनिया में पुष्टीमार्गीय संप्रदाय की सबसे प्रथम पीठ तौर पर मथुराधीश जी भगवान का मंदिर है। वल्लभाचार्य के सुदीर्घ परंपरा की यह प्रथम पीठ कोटा के पाटनपोल में विराजमान है, जिसकी वजह से ही इस क्षेत्र को नंद ग्राम भी कहा जाता है। इसके साथ ही कोटा के निकट ही चंबल किनारे केशवराय भगवान का मंदिर मौजूद है तो जैन धर्मावलंबियों भी प्रमुख तीर्थ हैं। जिस तरह से पिछले दस साल में धार्मिक पर्यटन बढ़ा है और उज्जैन, काशी, अयोध्या इसके नए उदाहरण के तौर पर उभरे हैं, उसी तरह कोटा में भी मथुराधीश जी को केन्द्र में रखकर धार्मिक के साथ विरासत और ऐतिहासिक पर्यटन को समग्र रूप से देश दुनिया के सामने पेश किया जाता वास्तव में कोटा में इस आयोजन को सफल माना जा सकता था और भविष्य में टूरिस्ट के जरिए कोटा ही नहीं, वरन पूरे संभाग की इकोनोमी को पंख लगते । पर्यटक न केवल अपने धर्म स्थलों का दौरा करते साथ ही यहां की ऐतिहासिक विरासत, मुकुंदरा टाइगर रिजर्व, चंबल घड़ियाल सेंचुरी, बूंदी का रामगढ़ विषधारी रिजर्व, झालरापाटन के सूर्य मंदिर और गागरोन के किले से लेकर भंडदेवरा तक उसके पास देखो वह सब कुछ होता जो शायद ही किसी इलाके में उपलब्ध होता। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस वे, रिंग रोड, नए नए रेल प्रोजेक्ट और ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट का निर्माण भी कोटा के पर्यटन को चार चांद लगाने में अपनी भूमिका निभाते, क्योंकि मथुराधीशजी की ऐतिहासिक पेंटिंग। ऐतिहासिक सिगरम में श्री मथुराधीशजी उदयपुर टूरिस्ट हब के तौर पर उभरा, वैसे ही कोटा भी मथुराधीश जी के आशीर्वाद से नया टूरिस्ट डेस्टिनेशन बन सकता है। मथुराधीशजी की महिमा 1801 ईस्वी में जब महाराव शत्रुसाल जी भगवान श्री मथुराधीश जी को बूंदी से कोटा लेकर पधारे, तब कोटा में ऐसा अभूतपूर्व उत्सव मना कि उसकी गूंज पूरे भारतवर्ष में सुनाई दी। उस समय भगवान के दर्शन के लिए उमड़ा जनसैलाब आज की शोभा यात्रा | अपार भीड़ उमड़ पड़ी। यह आयोजन कोटा को धार्मिक मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाने वाला सिद्ध हुआ।
लेकिन 1947 में रियासतों के विलय के बाद राजनीतिक चकाचौंध और बदलती प्राथमिकताओं के चलते कोटा के जनप्रतिनिधियों ने कभी गंभीर पहल नहीं की कि देश को यह बताया जा सके कि मथुराधीश जी की प्रथम पीठ कोटा में विराजमान है । प्रचार-प्रसार के अभाव में यह गौरवशाली विरासत धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई। आज आत्मा से कटा आयोजन कोटा हाडोती ट्रेवल मार्ट में तड़क-भड़क, मंचीय चमक और प्रचार-प्रसार की कोई कमी नहीं रही, लेकिन सबसे मूल प्रश्न... कोटा में ऐसा क्या है, जिसके लिए देश-विदेश से पर्यटक आएं? इस सवाल पर पूरा आयोजन लगभग मौन ही रहा । टूरिज्म का मूल तत्व गायब पूरे ट्रेवल मार्ट में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कोटा कोचिंग इंडस्ट्री की गिरावट से उपजी आर्थिक चुनौती से कैसे उबरेगा और कौन-सा ठोस आकर्षण पर्यटकों को यहां खींचेगा।
धार्मिक पर्यटन का आधार कोटा के पास धार्मिक पर्यटन की वह धुरी मौजूद है, जो किसी भी शहर को पर्यटन के नक्शे पर स्थापित कर सकती है। दुनिया में पुष्टिमार्गीय संप्रदाय की प्रथम पीठ भगवान मथुराधीश जी का मंदिर स्थित है। यदि मथुराधीश जी को केंद्र में रखकर धार्मिक, ऐतिहासिक और विरासत पर्यटन को समग्र रूप से प्रस्तुत किया जाता, तो यह ट्रेवल मार्ट वास्तव में ऐतिहासिक साबित हो सकता था। पर्यटक जब कोटा आते, तो उनके पास केवल एक मंदिर ही नहीं, बल्कि दुर्लभ पर्यटन स्थल उपलब्ध होते, जो शायद ही किसी एक क्षेत्र में एक साथ मिलते हों। इन्फ्रास्ट्रक्चर है, विजन नहीं सड़क, रेल और हवाई तीनों माध्यमों से कोटा तक पहुंच आसान हो रही है। बार-बार मथुराधीश जी कॉरिडोर की ओर ध्यान दिलाए जाने के बाद भी तथाकथित स्वयंभू उद्धारकों के मानस में यह विचार तक नहीं आया कि जैसे नाथद्वारा में भगवान श्रीनाथ जी की कृपा से उदयपुर पर्यटन का केंद्र बना, वैसे ही कोटा भी मथुराधीश जी के आशीर्वाद से नई पहचान हासिल कर सकता है।
अन्तर्राष्ट्रीय पुष्टि मार्गीय वैष्णव परिषद् कोटा अधिवेशन गो. श्री द्वारकेशलाल जी कामा, गो. श्री लालमणि जी, गो. श्री वल्लभलाल जी मथुराधीश कॉरिडोर: आस्था, विरासत और विकास के बीच संतुलन की तलाश
मथुराधीश जी मंदिर क्षेत्र में प्रस्तावित कॉरिडोर को लेकर शहर में व्यापक विमर्श शुरू हो गया है। हालांकि अभी तक कॉरिडोर की आधिकारिक ड्राइंग सामने नहीं आई है, लेकिन इसके निर्माण से दर्शन व्यवस्था में सुधार, भीड़ नियंत्रण, पार्किंग सुविधा और पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों, धार्मिक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और व्यापारियों का मानना है कि कॉरिडोर बनने से श्रद्धालुओं को वर्तमान की तंग गलियों से राहत मिलेगी और कोटा धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर सशक्त रूप से उभरेगा।
भ भी ऐतिहासिक प्रमाणों में दर्ज है। यह भी स्थिति यह है कि जब कोटा के पुनर्वास और जन सहमति जरूरी पहुंचने के लिए सडक, रेल और हवाई यातायात सहजता से उपलब्ध होते। लेकिन जननायक द्वारा बार- बार मथुराधीश जी कॉरिडोर की ओर ध्यान दिलाए जाने के बावजूद लगता नहीं कि कोटा के तथाकथित स्वयंभू उद्धारकों के दिमाग में यह विचार भी कौंधा हो कि जैसे नाथद्वारा में भगवान श्रीनाथ जी की कृपा से केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कोटा की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा की स्थापना का क्षण था। महाराव उम्मेद सिंह के काल में छप्पनभोग परिसर में आयोजित भव्य छप्पन भोग महोत्सव ने इस परंपरा को और सुदृढ़ किया । मथुराधीश जी की एक झलक पाने के लिए साधु-संतों, राजा-महाराजाओं, ठिकानेदारों और आम श्रद्धालुओं की लोग अन्य धार्मिक नगरियों में जाते हैं और स्वयं को कोटा निवासी बताते हैं, तो वहां के पुजारी और साधु-संत श्रद्धा से कहते हैं कि आपके यहां तो मथुराधीश जी की प्रथम पीठ है। यह कथन कोटा की उस आध्यात्मिक पहचान की याद दिलाता है, जिसे स्वयं कोटा अब तक पूरी तरह समझ और संजो नहीं पाया स्थानीय निवासियों और दुकानदारों ने कहा कि यदि भवन हटाए जाते हैं तो उन्हें उचित पुनर्वास और वैकल्पिक दुकानें उपलब्ध कराई जाएं। दो दशक से अधिक समय से किराए पर रह रहे परिवारों के लिए आवास व्यवस्था सुनिश्चित करने की भी मांग उठी है। यह भी सुझाव दिया गया कि पहले मास्टर प्लान तैयार कर आमजन की सहमति ली जाए, तभी यह परियोजना सफल और स्वीकार्य होगी। उन्होंने कहा कि बगैर पुनर्वास और मुआवजे के यहां रहने वाले पीड़ितों को न्याय नहीं मिलेगा। जबकि सरकार की ओर से तैयार की जा रही परियोजना है। इसलिए आमजन का ध्यान रखा जाना जरूरी है।
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