रुपये पर बढ़ा दबाव: डॉलर के मुकाबले 23 पैसे टूटा भारतीय रुपया, विदेशी निवेशकों की बिकवाली बनी बड़ी वजह
रुपये पर बढ़ा दबाव: डॉलर के मुकाबले 23 पैसे टूटा भारतीय रुपया, विदेशी निवेशकों की बिकवाली बनी बड़ी वजह
नई दिल्ली। भारतीय रुपया वैश्विक बाजारों के खुलने से पहले अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 23 पैसे की गिरावट के साथ 89.94 प्रति डॉलर के स्तर पर आ गया। विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, वैश्विक बाजारों में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति और कच्चे तेल की कीमतों में हल्का सुधार रुपये पर दबाव बढ़ा रहा है।
फॉरेन एक्सचेंज बाजार के जानकारों का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे डॉलर मजबूत हो रहा है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बन रहा है। भारतीय रुपया भी इसी दबाव से अछूता नहीं रहा।
बाजार पर दबाव उस समय और बढ़ गया जब विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने बुधवार को भारतीय शेयर बाजार में 1,721.26 करोड़ रुपये के शेयरों की शुद्ध बिकवाली की। लगातार पूंजी निकासी से न केवल शेयर बाजार कमजोर हुआ, बल्कि रुपये की मांग भी घटी, जिससे मुद्रा और फिसल गई।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा हाल ही में डॉलर-रुपया स्वैप और खुले बाजार परिचालन (OMO) के तहत सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद की घोषणा की गई थी। इन कदमों का उद्देश्य बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ाना और तरलता को संतुलित करना था। हालांकि, बाजार सहभागियों का मानना है कि इन उपायों से फिलहाल कोई खास सकारात्मक असर देखने को नहीं मिला है। विशेषज्ञों के अनुसार, डॉलर की मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ता अंतर अभी भी रुपये के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
इस बीच, कच्चे तेल की कीमतों में हल्का सुधार भी रुपये के लिए नकारात्मक संकेत माना जा रहा है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से आयात बिल बढ़ता है और चालू खाता घाटे पर दबाव आता है, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ता है।
आर्थिक शोध संस्थान ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने भी भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता जताई है। GTRI के अनुसार, वर्ष 2026 में भारत के निर्यात को अब तक के सबसे कठिन वैश्विक व्यापार माहौल का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ता संरक्षणवाद, वैश्विक मांग में सुस्ती और जलवायु से जुड़े नए व्यापार अवरोध एक साथ भारत के निर्यात पर दबाव डाल सकते हैं।
GTRI का अनुमान है कि 2026 में भारत के निर्यात में केवल 3 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिल सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो भारत के एक ट्रिलियन डॉलर के निर्यात लक्ष्य को हासिल करना काफी चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। कमजोर निर्यात प्रदर्शन का असर भी रुपये की स्थिरता पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में रुपये की चाल काफी हद तक वैश्विक संकेतों, अमेरिकी ब्याज दरों, विदेशी निवेशकों के रुख और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगी। जब तक वैश्विक अनिश्चितताएं कम नहीं होतीं और पूंजी प्रवाह स्थिर नहीं होता, तब तक रुपये पर दबाव बने रहने की संभावना है।
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