रूस-बेलारूस संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘जापाद’ शुरू, पूर्वी यूरोप में बढ़ी चिंता
मॉस्को/मिन्स्क: रूस और बेलारूस ने सोमवार से अपने बहुप्रतीक्षित संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘जापाद (Zapad) ड्रिल्स’ की शुरुआत कर दी है। इन अभ्यासों का उद्देश्य आधिकारिक रूप से दोनों देशों की सैन्य क्षमताओं और तालमेल को मजबूत करना बताया गया है। लेकिन, पूर्वी यूरोप में इसने गहरी चिंता पैदा कर दी है, खासकर हाल के हवाई क्षेत्र उल्लंघनों (airspace incursions) के बाद।
अभ्यास का पैमाना और उद्देश्य
‘जापाद’ अभ्यास रूस और बेलारूस हर चार साल में आयोजित करते हैं, जिनमें जमीनी, वायु और समुद्री सेनाएँ शामिल होती हैं। इस बार के अभ्यास में हजारों सैनिक, दर्जनों टैंक, युद्धक विमान और मिसाइल प्रणालियाँ शामिल की गई हैं। रूस के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि इन अभ्यासों का उद्देश्य “रक्षा तैयारियों का परीक्षण और संभावित खतरों के खिलाफ संयुक्त प्रतिक्रिया क्षमता को परखना” है।
पूर्वी यूरोप की चिंता
पड़ोसी देशों पोलैंड, लिथुआनिया और लातविया ने इन ड्रिल्स पर गहरी चिंता व्यक्त की है। इन देशों का कहना है कि हाल के दिनों में रूसी और बेलारूसी विमानों ने उनके हवाई क्षेत्र के पास कई बार घुसपैठ की कोशिश की है। नाटो (NATO) ने भी स्थिति पर नज़र रखने की पुष्टि की है और कहा है कि यदि क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा हुआ तो आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि
ये सैन्य अभ्यास ऐसे समय पर हो रहे हैं जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है। पश्चिमी देशों का मानना है कि रूस इन ड्रिल्स के जरिए अपने पड़ोसी देशों और नाटो को अप्रत्यक्ष संदेश देना चाहता है। बेलारूस, जो रूस का करीबी सहयोगी है, ने भी अपने क्षेत्र को रूसी बलों के लिए उपलब्ध कराया है।
रूस और बेलारूस की सफाई
रूस और बेलारूस दोनों ने साफ किया है कि ‘जापाद’ अभ्यास किसी भी तीसरे देश के खिलाफ नहीं हैं और यह केवल “रक्षात्मक” प्रकृति के हैं। बेलारूस के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि ये अभ्यास लंबे समय से तय थे और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन कर रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय
सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि इन ड्रिल्स से पूर्वी यूरोप में तनाव और बढ़ सकता है। नाटो देशों में पहले से ही रक्षा तैयारियों को लेकर हलचल तेज है और इन अभ्यासों से असुरक्षा की भावना और गहरी हो सकती है।
निष्कर्ष
‘जापाद’ ड्रिल्स ने एक बार फिर रूस-नाटो संबंधों को सुर्खियों में ला दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ये अभ्यास महज़ सैन्य प्रशिक्षण तक सीमित रहते हैं या फिर पूर्वी यूरोप में भू-राजनीतिक तनाव को और बढ़ा देंगे।
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