कोटा का भविष्य धार्मिक पर्यटन में, आधार बने मथुराधीश जी का मंदिर
कोटा का भविष्य धार्मिक पर्यटन में, आधार बने मथुराधीश जी का मंदिर
शैलेश पाण्डेय
कोटा
कोटा को पर्यटन नगरी बनाने का सपना तभी साकार हो सकता है, जब उसके सबसे पवित्र, सबसे जीवंत और सबसे अधिक आकर्षण वाले केंद्र — श्री मथुराधीश जी मंदिर — को विकास के केंद्र में रखा जाए। पर्यटन केवल इमारतें चमकाने या नए पार्क बनाने का नाम नहीं है, बल्कि यह आस्था, इतिहास, संस्कृति और आर्थिक समृद्धि का समन्वय है। और इस समन्वय की सबसे मजबूत नींव कोटा में पहले से मौजूद है — मथुराधीश जी की दिव्य भूमि।
कोटा का इतिहास साक्षी है कि यह शहर कभी चंबल नदी के किनारे बसे उद्योगों की धड़कन से जीवंत रहता था। कपड़ा, बिजली और अन्य उद्योगों ने यहां रोजगार और आर्थिक स्थिरता दी। जब उद्योग बंद हुए, तब मेडिकल और आईआईटी कोचिंग ने शहर को नई पहचान और नई सांस दी। लेकिन दुर्भाग्यवश, कोचिंग को लेकर हुई राजनीति और नीतिगत प्रहारों ने इस व्यवस्था की रीढ़ को भी हिला दिया। अब एक बार फिर मंचों और भाषणों में “कोटा को पर्यटन नगरी बनाने” का शिगूफा छोड़ा जा रहा है।
विडंबना यह है कि जिन लोगों ने वर्षों तक उद्योग, व्यापार और कोचिंग के नाम पर राजनीति की, वही आज पर्यटन नगरी का सपना परोस रहे हैं, जबकि धरातल पर कोटा की पर्यटन संरचना की सच्चाई बेहद निराशाजनक है। शहर के बाहर स्थित अभेड़ा महल और उम्मेदगंज पक्षी विहार को छोड़ दें तो शहर के भीतर मौजूद किशोरसागर का जलमहल, गवर्नमेंट कॉलेज की ऐतिहासिक इमारत, घंटाघर और अन्य अनेक ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल बदहाली के शिकार हैं। 70 के दशक का भीतरिया कुंड, चंबल गार्डन, दो दशक पुराना सेवन वंडर्स और हाल में बना सिटी पार्क व रिवर फ्रंट — इन सभी के रखरखाव की कमजोरियां आए दिन उजागर होती रहती हैं। ऐसे में केवल पर्यटन नगरी का दावा करना हास्यास्पद प्रतीत होता है।
इस पूरी बहस में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि पुष्टिमार्ग की प्रथम पीठ — श्री मथुराधीश जी मंदिर — को पर्यटन विकास की योजनाओं में लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। जबकि देश-विदेश के पुष्टिमार्गीय श्रद्धालुओं में इस मंदिर की प्रतिष्ठा सर्वोच्च है। मान्यता है कि मथुराधीश जी का विग्रह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने महाप्रभु वल्लभाचार्य जी को सौंपा था। यह तथ्य ही इस मंदिर को असाधारण महत्व प्रदान करता है।
प्रतिदिन 10 से 15 हजार श्रद्धालु बालरूप श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए यहां आते हैं। जन्माष्टमी, होली, रामनवमी, नवरात्र, दशहरा और अन्य उत्सवों पर यह संख्या अनुमान से परे पहुंच जाती है। आज़ाद भारत में लंबी कानूनी लड़ाई जीतने के बाद जब मथुराधीश जी के विग्रह की पुनः प्रतिष्ठा हुई थी, उस दिन कोटा ने ऐसा जनसैलाब देखा, जो शहर के इतिहास में अभूतपूर्व था। प्रभु की शोभायात्रा जिस मार्ग से निकली, उसकी हर छत, हर कंगूरा मानो श्रद्धा से भर गया था। यह दृश्य बताता है कि आस्था की शक्ति कितनी व्यापक और गहरी है।
इतनी विशाल आस्था का केंद्र होने के बावजूद यह क्षेत्र आज योजनाकारों, राजनेताओं और तथाकथित पर्यटन ब्रांड एम्बेसडरों की प्राथमिकता सूची में कहीं नहीं दिखता। सवाल यह है कि जब कोटा के पास पहले से एक ऐसा जीवंत धार्मिक केंद्र मौजूद है, जो साल भर लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, तो उसे नजरअंदाज कर पर्यटन कैसे विकसित किया जा सकता है?
पिछले एक दशक में भारत में धार्मिक पर्यटन का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद वाराणसी में विदेशी और घरेलू पर्यटकों की संख्या कई गुना बढ़ गई। उज्जैन के महाकाल कॉरिडोर ने न केवल धार्मिक अनुभव को बेहतर बनाया, बल्कि शहर की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दी। आज त्योहारों के समय उज्जैन के होटल पूरी तरह भरे रहते हैं। अयोध्या में श्रीराम मंदिर ने दुनिया भर के श्रद्धालुओं को आकर्षित कर एक नए पर्यटन युग की शुरुआत कर दी है। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि जब धार्मिक आस्था को सुव्यवस्थित, संवेदनशील और दूरदर्शी ढांचे से जोड़ा जाता है, तो पूरे शहर का आर्थिक और सामाजिक चेहरा बदल सकता है।
आज जब देश में धार्मिक पर्यटन निरंतर बढ़ रहा है और राजस्थान में डबल इंजन की सरकार है, तब कोटा के पास भी एक सुनहरा अवसर है। आवश्यकता इस बात की है कि नीति निर्माता केवल अखबारी बयानों, फोटो खिंचवाने और औपचारिक बैठकों से आगे बढ़ें। यदि मथुराधीश जी मंदिर को केंद्र में रखकर एक समग्र धार्मिक पर्यटन योजना बनाई जाए और सबसे महत्वपूर्ण — मंदिर प्रबंधन को सहयोगी बनाकर विश्वास में लिया जाए — तो कोटा का परिदृश्य बदला जा सकता है।
रिवर फ्रंट जैसी दिखावटी परियोजनाओं पर अरबों रुपये झोंकने के बजाय यदि यही संसाधन आधारभूत ढांचे, पार्किंग व्यवस्था, परिक्रमा पथ, सड़क चौड़ीकरण, स्वच्छता, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं और पूरे मंदिर क्षेत्र के संवेदनशील एवं मर्यादित सौंदर्यीकरण पर खर्च किए जाएं, तो कोटा को वास्तविक, टिकाऊ और सांस्कृतिक पर्यटन मिल सकता है। इससे न केवल श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव मिलेगा, बल्कि स्थानीय व्यापार, होटल, परिवहन और रोजगार को भी स्थायी बढ़ावा मिलेगा।
कोटा का भविष्य ऊंची इमारतों या केवल नए पार्कों में नहीं, बल्कि उसकी आत्मा में बसने वाली आस्था में है। यदि इस आस्था को समझदारी, सम्मान और दूरदृष्टि के साथ विकास से जोड़ा जाए, तो मथुराधीश जी का मंदिर कोटा को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर एक नई और स्थायी पहचान दिला सकता है। यही कोटा के लिए सबसे सशक्त, स्वाभाविक और सफल रास्ता है।
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