आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की मेनका गांधी को कड़ी फटकार, बयान को बताया अवमानना के दायरे में

जनवरी 21, 2026 - 18:02
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आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की मेनका गांधी को कड़ी फटकार, बयान को बताया अवमानना के दायरे में

आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की मेनका गांधी को कड़ी फटकार, बयान को बताया अवमानना के दायरे में

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 20 जनवरी 2026 को पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (BJP) की वरिष्ठ नेता मेनका गांधी को आवारा कुत्तों से जुड़े मामले में अदालत के आदेशों की आलोचना करने पर कड़ी फटकार लगाई। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मेनका गांधी के बयान न्यायपालिका की अवमानना की श्रेणी में आते हैं और ये न केवल असंवेदनशील हैं, बल्कि कानून के शासन को कमजोर करने वाले भी हैं।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि मेनका गांधी ने “बिना सोचे-समझे सभी के खिलाफ हर तरह की टिप्पणियां” की हैं। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने बयानों में संयम और जिम्मेदारी बरतें, खासकर तब जब मामला न्यायालय के विचाराधीन हो।

पीठ ने सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प लेकिन सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मेनका गांधी के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने कभी अजमल कसाब जैसे आतंकी के लिए भी अदालत में पेशी की थी। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि अजमल कसाब ने कभी अदालत की अवमानना नहीं की थी, जबकि मेनका गांधी के बयानों में अवमानना के तत्व स्पष्ट रूप से मौजूद हैं। इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने यह संदेश दिया कि कानून के सामने व्यक्ति का दर्जा या पहचान नहीं, बल्कि उसका आचरण मायने रखता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मेनका गांधी के बयान न केवल अदालत के आदेशों का उल्लंघन करते हैं, बल्कि वे समाज में नफरत और टकराव को भी बढ़ावा देते हैं। पीठ के अनुसार, इस तरह की टिप्पणियां संवेदनशील मुद्दों को और अधिक जटिल बना देती हैं, जबकि अदालत का उद्देश्य संतुलित और व्यावहारिक समाधान निकालना होता है।

हालांकि, इतनी सख्त टिप्पणियों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मेनका गांधी के खिलाफ औपचारिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला उसकी “उदारता” के कारण लिया गया है। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में इस तरह के बयानों को हल्के में नहीं लिया जाएगा और जरूरत पड़ने पर सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।

गौरतलब है कि मेनका गांधी लंबे समय से पशु अधिकारों और खासकर आवारा कुत्तों के मुद्दे पर मुखर रही हैं। इससे पहले भी उन्होंने आवारा कुत्तों के मामले में अदालत के रुख पर सवाल उठाए थे। उनका कहना रहा है कि समस्या कुत्तों की नहीं, बल्कि सिविक सिस्टम की विफलता की है, जो नसबंदी, टीकाकरण और प्रबंधन जैसे बुनियादी कार्यों को सही ढंग से लागू नहीं कर पा रहा है।

इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक स्पष्ट संदेश है कि न्यायपालिका की आलोचना और अवमानना के बीच की रेखा बहुत पतली होती है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन वह कानून और संवैधानिक मर्यादाओं के दायरे में ही होनी चाहिए।

कुल मिलाकर, यह मामला न केवल आवारा कुत्तों के मुद्दे से जुड़ा है, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार बयानबाजी और न्यायपालिका के सम्मान से जुड़े बड़े सवालों को भी सामने लाता है।

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