कोविड के बाद भारत में वायु प्रदूषण बना सबसे बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट, डॉक्टरों ने दी गंभीर चेतावनी
कोविड के बाद भारत में वायु प्रदूषण बना सबसे बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट, डॉक्टरों ने दी गंभीर चेतावनी
नई दिल्ली। भारत में वायु प्रदूषण अब कोविड-19 महामारी के बाद सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है। ब्रिटेन में कार्यरत भारतीय मूल के डॉक्टरों ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताते हुए चेतावनी दी है कि वायु प्रदूषण के कारण देश में फेफड़ों और हृदय संबंधी बीमारियों का एक विशाल लेकिन छिपा हुआ बोझ लगातार बढ़ रहा है, जिसका समय पर निदान और उपचार नहीं हो पा रहा है।
डॉक्टरों के अनुसार, वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियां धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं और अक्सर इसके शुरुआती लक्षणों को मामूली समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। सिरदर्द, थकान, हल्की खांसी, सांस फूलना और आंखों में जलन जैसे लक्षण सामान्य दिखते हैं, लेकिन ये गंभीर फेफड़ों और हृदय रोगों के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, भारत में वर्ष 2022 में वायु प्रदूषण के कारण 17 लाख से अधिक मौतें हुईं। इनमें से करीब 2.69 लाख मौतें केवल पेट्रोल के उपयोग से होने वाले प्रदूषण से जुड़ी बताई जाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा अपने आप में एक चेतावनी है कि प्रदूषण अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है।
दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में हालात और भी चिंताजनक हैं। दिल्ली के अस्पतालों में दिसंबर महीने के दौरान सांस से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या में 20 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। खास बात यह है कि इनमें बड़ी संख्या में नए मरीज और युवा लोग भी शामिल हैं, जो पहले गंभीर बीमारियों से ग्रस्त नहीं थे।
डॉक्टरों ने चेताया है कि उत्तर भारत में लाखों लोगों के फेफड़ों को पहले ही गंभीर नुकसान पहुंच चुका है। आने वाले वर्षों में फेफड़ों की बीमारियों की एक “मौन सुनामी” आने की आशंका है, जो स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव डाल सकती है। यदि अभी ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट हर साल और गंभीर होता जाएगा।
हालांकि, भारत सरकार ने अब तक वायु प्रदूषण और फेफड़ों की बीमारियों के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध स्थापित करने वाला कोई ठोस राष्ट्रीय डेटा प्रस्तुत नहीं किया है। सरकार ने यह जरूर स्वीकार किया है कि प्रदूषण श्वसन रोगों के बढ़ने का एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल स्वीकारोक्ति पर्याप्त नहीं है।
ब्रिटेन में काम कर रहे भारतीय डॉक्टरों ने सुझाव दिया है कि भारत में तुरंत एक राष्ट्रीय फेफड़ा स्वास्थ्य टास्क फोर्स का गठन किया जाए। इसके साथ ही, बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग, जल्दी निदान और समय पर उपचार के लिए विशेष स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। उनका कहना है कि जैसे कोविड के दौरान देश ने सामूहिक प्रयास किए, वैसे ही वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों से निपटने के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर ठोस रणनीति की जरूरत है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रदूषण नियंत्रण, जन-जागरूकता और स्वास्थ्य निगरानी को प्राथमिकता दी जाए, तो आने वाले वर्षों में लाखों जिंदगियों को बचाया जा सकता है। वायु प्रदूषण अब भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि वर्तमान का सबसे बड़ा स्वास्थ्य खतरा बन चुका है, जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
आपकी क्या प्रतिक्रिया है?