संविधान दिवस 2025: राष्ट्रपति ने जारी किए नौ भाषाओं में संविधान के डिजिटल अनुवाद, लोकतांत्रिक मूल्यों को दोहराया संकल्प
संविधान दिवस 2025: राष्ट्रपति ने जारी किए नौ भाषाओं में संविधान के डिजिटल अनुवाद, लोकतांत्रिक मूल्यों को दोहराया संकल्प
आज, 26 नवंबर 2025, पूरे देश में 76वां राष्ट्रीय संविधान दिवस अत्यंत गरिमा और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर राष्ट्रभर में विभिन्न सरकारी, शैक्षणिक एवं सामाजिक संस्थानों में संविधान की प्रस्तावना का वाचन किया गया और नागरिकों में संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का संदेश दिया गया।
दिल्ली स्थित संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित राष्ट्रीय समारोह की अध्यक्षता राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने की। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण था—भारतीय संविधान के नौ भाषाओं में डिजिटल अनुवाद जारी करना। इन भाषाओं में मलयालम, मराठी, नेपाली, पंजाबी, बोडो, कश्मीरी, तेलुगु, ओडिया और असमिया शामिल हैं। राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि यह कदम भाषाई विविधता को सम्मान देने के साथ-साथ संविधान को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने संविधान के ऐतिहासिक महत्व और उसकी वैचारिक नींव पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने ऐसा दस्तावेज तैयार किया, जिसमें हर नागरिक की स्वतंत्रता, समानता और न्याय की गारंटी हो। उनके अनुसार, संविधान न केवल शासन व्यवस्था का ढांचा है, बल्कि यह भारत की लोकतांत्रिक आत्मा और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतिबिंब भी है।
राष्ट्रपति मुर्मू ने कार्यक्रम में संविधान की प्रस्तावना (Preamble) का सामूहिक वाचन कराया और कहा कि प्रस्तावना भारत के लोकतांत्रिक चरित्र, संप्रभुता और नागरिक अधिकारों की स्पष्ट परिभाषा प्रस्तुत करती है। उन्होंने इस बात पर गर्व जताया कि देश ने पिछले वर्षों में अभूतपूर्व सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन देखे हैं, विशेष रूप से गरीबी रेखा से 25 करोड़ लोगों को बाहर निकालना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, जिसका श्रेय सामूहिक प्रयासों, जनकल्याणकारी योजनाओं और संवैधानिक प्रतिबद्धता को जाता है।
अपने भाषण में राष्ट्रपति ने तीन तलाक जैसी सामाजिक कुरीतियों पर रोक लगाने को महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि संविधान हमेशा उन प्रयासों का समर्थन करता है, जो समाज में समानता और न्याय स्थापित करते हैं।
इसके अलावा, उन्होंने अनुच्छेद 370 जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन का उल्लेख करते हुए कहा कि इससे देश की एकता मजबूत हुई और संविधान से सुनिश्चित स्वाभिमान का विस्तार हुआ है। उनके अनुसार, यह कदम राष्ट्रीय अखंडता की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है, जिसने जम्मू-कश्मीर को विकास और प्रगति की नई राह दिखाई है।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन का समापन करते हुए नागरिकों से अपील की कि वे संविधान में निहित मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—को अपने व्यवहार और जीवनशैली का हिस्सा बनाएं। उन्होंने कहा कि संविधान केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि देश के भविष्य को दिशा देने वाली जीवंत धरोहर है, जिसे संरक्षण और सम्मान देना हर भारतीय की जिम्मेदारी है।
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