नई दिल्ली। केंद्र की शिक्षा सामग्री में सेंध लगने वाले एक विवाद ने शिक्षा और न्याय व्यवस्था के बीच गंभीर राजनीति खड़ी कर दी है
नई दिल्ली। केंद्र की शिक्षा सामग्री में सेंध लगने वाले एक विवाद ने शिक्षा और न्याय व्यवस्था के बीच गंभीर राजनीति खड़ी कर दी है। कक्षा 8 की एनसीईआरटी (NCERT) के सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में शामिल एक अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील विषय को बेहद सरल रूप में प्रस्तुत करने के कारण मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस प्रकार की चूक किसी भी दशा में स्वीकार्य नहीं है और इसके लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री ने सवाल उठाया कि जब देश की शिक्षा सामग्री तैयार की जा रही थी तो ऐसे संवेदनशील मुद्दों की समीक्षा और निगरानी कौन कर रहा था। उन्होंने कहा कि बच्चों की सोच और सामाजिक प्रमाणिकता पर असर डालने वाला यह विषय सहज रूप से शामिल नहीं होना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की प्रक्रिया में पर्याप्त विशेषज्ञ समीक्षा, संवैधानिक दृष्टिकोण और समाज के विविध दृष्टिकोण को सुपर वरीयता से लेना आवश्यक है।
इस विवाद के फैलते ही एनसीईआरटी की ओर से बिना शर्त माफी जारी की गई। एनसीईआरटी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अनुरोध पर तुरंत ही उक्त किताब के वितरण को रोक दिया है और इसे वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। एनसीईआरटी अध्यक्ष ने मीडिया से कहा कि यह गलती तथ्यात्मक दृष्टिकोण का नहीं बल्कि समीक्षा एवं परामर्श प्रक्रिया में अनदेखी के कारण हुई है और इसके लिए वे जिम्मेदार हैं।
परिषद ने आगे कहा कि पाठ्यपुस्तक में किसी भी संवेदनशील विषय को शामिल करने से पहले सम्पूर्ण समीक्षा समिति की स्वीकृति अनिवार्य रूप से ली जाएगी। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि भविष्य में ऐसी चूक को दोबारा नहीं होने दिया जाएगा।
वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तीव्र कार्रवाई करते हुए एनसीईआरटी अध्यक्ष और शिक्षा सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। शीर्ष न्यायालय ने सवाल उठाया कि संवैधानिक संस्थाओं के संबंध में पाठ्यपुस्तक में इस तरह की सामग्री शामिल होने का आधार क्या रहा और क्या समीक्षा मानकों के अनुरूप यह किया गया था? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की गरिमा और संवैधानिक प्रतिष्ठा को बिना उचित परिप्रेक्ष्य दर्शाए किसी भी शैक्षिक पुस्तक में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस विवाद पर खेद व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार का उद्देश्य न्यायपालिका का अपमान या अवमानना करना कभी नहीं था। उन्होंने कहा, “हमारी प्राथमिकता बच्चों को सटीक, संतुलित और संवैधानिक दृष्टिकोण से शिक्षित करना है। इस त्रुटि के लिए हम माफी मांगते हैं और आवश्यक सुधारात्मक उपायों पर काम कर रहे हैं।”
घटना के बाद केंद्र सरकार ने जवाबदेही की प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया है। शिक्षा मंत्रालय ने आदेश जारी कर कहा है कि पाठ्यपुस्तक सामग्री तैयार करने वाली टीमों में विधि विशेषज्ञों, सामाजिक वैज्ञानिकों और संवैधानिक विद्वानों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा। साथ ही पाठ्यक्रम संशोधन के लिए कड़े समीक्षा मैकेनिज्म को लागू किया जाएगा।
विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद न केवल शैक्षिक समीक्षा में गंभीरता की कमी को दर्शाता है बल्कि यह भी इंगित करता है कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान और संतुलन को प्राथमिकता देना कितना आवश्यक है। सरकार के कदम अब इस बात पर केंद्रित हैं कि भविष्य में ऐसी गलतियाँ शैक्षिक सामग्री में दोबारा न हो सकें और विद्यार्थी सही, संतुलित व संवैधानिक दृष्टिकोण से पढ़ाई करें।
आपकी क्या प्रतिक्रिया है?