राहुल गांधी बनाम चुनाव आयोग विवाद
यह है राहुल गांधी बनाम चुनाव आयोग विवाद की मुख्य खबर का सारांश
राहुल गांधी का बड़ा दावा:
"भारत का इलेक्शन सिस्टम मर चुका है"
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राहुल गांधी ने दिल्ली में आयोजित लीगल कॉन्क्लेव-2025 में चुनाव आयोग और भारत की चुनाव प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
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कहा कि अगर 10-15 सीटों पर धांधली न होती, तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते।
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दावा किया कि हमारे पास ठोस सबूत हैं, जल्द ही देश के सामने रखेंगे।
राहुल गांधी के चार बड़े आरोप:
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2014 से चुनाव प्रणाली पर शक था, अब ठोस सबूत मिल चुके हैं।
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महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच 1 करोड़ नए वोटर जुड़े, ज्यादातर वोट भाजपा को गए।
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चुनाव आयोग जैसी संस्था खत्म हो चुकी है, उसका कोई अस्तित्व नहीं बचा।
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मतदाता सूची पर स्कैन/कॉपी प्रोटेक्शन क्यों लगाया गया? चुनाव आयोग पारदर्शी क्यों नहीं है?
पहले के बयान:
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1 अगस्त: राहुल बोले – “मेरे पास 100% सबूत हैं, चुनाव आयोग भाजपा के लिए वोट चुराता है।”
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24 जुलाई: कहा – “कर्नाटक की एक सीट पर हजारों नए बुजुर्ग वोटर जोड़े गए, युवाओं के नाम हटाए गए।”
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आरोप लगाया – हर सीट पर ऐसा ही फर्जीवाड़ा हो रहा है।
राजनाथ सिंह का पलटवार:
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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बोले –
“अगर आपके पास सबूतों का एटम बम है, तो फोड़ दीजिए। लेकिन इतना ध्यान रखिए कि आप सुरक्षित रहें।”
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उन्होंने राहुल के आरोपों को राजनीतिक स्टंट बताया।
चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया:
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राहुल के आरोपों को निराधार और गैरजिम्मेदाराना बताया।
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चुनाव अधिकारियों से कहा –
“किसी दबाव में न आएं, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से काम जारी रखें।”
बिहार वोटर लिस्ट विवाद:
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बिहार में वोटर लिस्ट से 65 लाख नाम हटे:
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22 लाख मौतों के कारण,
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36 लाख स्थानांतरित,
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7 लाख नए स्थानों पर स्थायी रूप से बस चुके लोग।
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यह नाम SIR (Special Intensive Revision) के तहत हटाए गए।
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कुल मतदाता अब घटकर 7.24 करोड़ रह गए हैं, पहले थे 7.89 करोड़।
SIR विशेष अभियान:
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24 जून से 25 जुलाई 2025 तक चला।
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99.8% कवरेज हासिल की गई।
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लक्ष्य: फर्जी और दोहराए गए वोटर हटाना, योग्य नए जोड़ना।
निष्कर्ष:
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राहुल गांधी ने चुनाव प्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठाए और सबूतों का वादा किया है।
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सरकार और चुनाव आयोग ने उनके आरोपों को खारिज कर राजनीतिक नौटंकी बताया है।
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बिहार की वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर बदलाव विपक्ष के शक को और हवा दे रहे हैं।
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अब सबकी निगाहें राहुल गांधी द्वारा प्रकाशित किए जाने वाले तथाकथित "सबूतों" पर टिकी हैं।
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